बचत अचानक आए खर्च को संभालने के लिए कुछ समय दे सकती है। छोटी रकम भी तुरंत उधार लेने की ज़रूरत कम कर सकती है।
महीने के आखिर में पैसे बच जाने की उम्मीद रखने के बजाय बचत को अपनी योजना में जगह देने से शुरुआत होती है।
एक उदाहरण
किसी को नियमित वेतन मिलने लगा है। वह सोचता है कि जो बचेगा, बचा लेगा। किराया, खाना, सफर, परिवार की मदद और छोटी खरीदारी में लगभग पूरी रकम खर्च हो जाती है। अगले महीने भी यही होता है।
ज़रूरी खर्च देखने के बाद उसे समझ आता है कि थोड़ी रकम अलग रखना संभव है। वेतन मिलते ही वह उसे अलग रख देता है।
सिर्फ हिसाब समझने के लिए, छह बार 200 बचाने पर 1,200 होते हैं। इसमें कोई शुल्क या ब्याज नहीं जोड़ा गया है। यह केवल उदाहरण है; सही रकम अपनी क्षमता पर निर्भर करती है।
इस उदाहरण में बचत ने हर समस्या हल नहीं की। लेकिन अचानक हुई मरम्मत का कुछ खर्च देना आसान हुआ।
किसी महीने कम बचत हुई या बचाया पैसा खर्च करना पड़ा। इससे पहले की कोशिश बेकार नहीं हुई। बचत ज़रूरत पड़ने पर मदद के लिए ही होती है।
मैंने क्या सीखा
कुछ लोगों की आमदनी से ज़रूरी खर्च ही मुश्किल से चलते हैं। इलाज, परिवार की ज़िम्मेदारी या अनिश्चित काम के कारण बचत की गुंजाइश नहीं रह सकती। यह कठिन परिस्थिति है, व्यक्ति की नाकामी नहीं।
बचत की योजना के कारण खाना या दूसरी ज़रूरी चीज़ें कम नहीं पड़नी चाहिए। गुंजाइश हो तब शुरू करें और ज़िम्मेदारियाँ बदलें तो योजना भी बदलें।
रकम तय करने से पहले देखें कि कौन-से खर्च देने ही हैं। ऐसी बचत चुनें जिसे दोहरा सकें, न कि बड़ी रकम बचाकर बाद में उधार लेना पड़े।
अचानक आने वाले खर्च और पहले से पता खर्च, जैसे सालाना फीस, के पैसे अलग सोचें। दोनों ज़रूरी हैं, लेकिन उनका काम अलग है।
जल्द ज़रूरत पड़ने वाले पैसे ऐसी उचित जगह रखें जहाँ से समय पर निकाल सकें। शुल्क और शर्तें समझें। जल्द चाहिए पैसा ऐसे निवेश पर निर्भर न हो जिसका मूल्य गिर सकता है।
कभी-कभी योजना फिर देखें। सामान्य खुशियों और परिवार की ज़िम्मेदारियों के लिए भी जगह रखें ताकि बचत रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा बनी रहे।
मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे बचत को अपने विकल्प सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल करें, अपनी कीमत साबित करने के लिए नहीं। जितना संभव है, उससे शुरू करें। किसी और का प्रतिशत अपनाने से बेहतर है अपनी ज़िंदगी के हिसाब से योजना बनाना।
आज यह करके देखें
- देखें कि कितना संभव है।अगली आमदनी और उससे पूरे होने वाले ज़रूरी खर्च लिखें।
- छोटी रकम से शुरुआत करें।गुंजाइश हो तो आमदनी मिलते ही वह रकम अलग रखें।
- उसका उद्देश्य लिखें।तय करें कि यह रकम अचानक आने वाले खर्च के लिए है या पहले से पता खर्च के लिए।
आपके लिए एक सवाल
ज़रूरी खर्च बाकी छोड़े बिना कितनी रकम अलग रख सकते हैं?