परवाह सिर्फ आपात स्थिति में मदद करने से नहीं दिखती। किसी की रोज़ की बात सुनने, साथ खाना खाने या लौटकर फोन करने में भी दिखती है।

साथ देने का मतलब हर समय उपलब्ध रहना नहीं है। कुछ समय ऐसा देना है जब आपका ध्यान सचमुच सामने वाले के साथ हो।

एक उदाहरण

एक उदाहरण सोचिए। एक पिता परिवार के लिए मेहनत करते हैं। शाम को जब बच्चा कुछ कहना चाहता है, तभी काम का एक और संदेश आ जाता है।

पिता कहते हैं, “एक मिनट।” फिर दूसरा काम आ जाता है और सोने का समय हो जाता है। कोई बड़ी घटना नहीं होती, लेकिन धीरे-धीरे बच्चा छोटी बातें बताना कम कर देता है। उसे लगता है कि ध्यान पाना मुश्किल है।

पिता यह देखकर रात के खाने के बाद दस मिनट अलग रखते हैं। फोन दूर रखते हैं और बच्चे को अपनी पसंद की बात कहने देते हैं। किसी दिन शांति रहती है; किसी दिन हँसी, सवाल या चिंता की बात होती है।

इस उदाहरण में साथ बिताया समय हर बातचीत को आसान नहीं बनाता। लेकिन किसी बड़ी समस्या का इंतज़ार किए बिना जुड़ने का नियमित मौका देता है।

यह तरीका दोस्त, जीवनसाथी या भाई-बहन के साथ भी काम आ सकता है। नियमित छोटा फोन या साथ टहलना उस बड़े वादे से अधिक उपयोगी हो सकता है जो शायद ही पूरा हो।

मैंने क्या सीखा

पैसे देना, समस्याएँ सुलझाना और बीमारी में देखभाल करना प्यार के असली रूप हैं। फिर भी वे हमेशा सुनने की जगह नहीं लेते।

कोई हर अनुरोध पर पूरा ध्यान नहीं दे सकता। काम, आराम और निजता भी ज़रूरी हैं। दोष महसूस करने से दिन में घंटे नहीं बढ़ेंगे। जितना समय दे सकते हैं, उसका सच्चा वादा करें।

ऐसा समय चुनें जिसे नियमित रख सकें। ध्यान भटकाने वाली एक चीज़ दूर करें और सरल सवाल पूछें, जैसे “वह मुश्किल बैठक कैसी रही?” जवाब सुनने तक रुकें।

हर परेशानी में सलाह चाहिए, यह न मानें। पूछ सकते हैं, “मदद चाहिए या अभी बस चाहते हो कि मैं सुनूँ?”

अभी नहीं सुन सकते तो ऐसा समय बताएँ जिसे निभा सकें। वादे के अनुसार लौटें। भूल जाएँ या ध्यान भटक जाए तो मानें और फिर कोशिश करें। रिश्ते लगातार देखभाल से बढ़ते हैं, हर बार बिल्कुल सही होने से नहीं।

मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे जानें कि उनकी रोज़ की बातें भी महत्वपूर्ण हैं। न मैं हर बार पूरी तरह सुन पाऊँगा, न वे। ज़रूरी है दूरी बढ़ने को पहचानना और फिर एक-दूसरे के लिए समय निकालना।

आज यह करके देखें

  1. दस मिनट अलग रखें।आज कोई समय चुनें जब फोन देखे बिना किसी के साथ रहें।
  2. पूछें और सुनें।अपनी बात या सलाह देने से पहले सामने वाले को बात पूरी करने दें।
  3. एक नियमित योजना बनाएँ।दोनों को ठीक लगे तो साथ खाने, टहलने या फोन करने का समय रखें।

आपके लिए एक सवाल

इस हफ्ते किसे दस मिनट बिना जल्दबाज़ी के सुन सकते हैं?